बिलासपुर। मंगोलिया, कजाकिस्तान और रसिया जैसे देशों से आने वाले प्रवासी पक्षी “बार हेडेड गुज” यानी राजहंस वापस अपने देश लौटने लगे है। लौटने के पहले शहर से लगे कोपरा जलाशय उनके लिए विश्राम स्थल बना हुआ है। यहां इन दिनों राजहंस के झुंड, पक्षी प्रमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए है। जलाशय में इन पक्षियों को अटखेलियां करते हुए देखा जा रहा है।

कोपरा जलाशय पिछले कुछ दिनों से प्रवासी पक्षी “बार हेडेड गुज” स्थानीय भाषा मे “राजहंस” के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। जलाशय में प्रतिदिन सैकड़ो की संख्या में ये पक्षी आ रहे है और कुछ देर विश्राम करने के बाद अपने गंतब्य की ओर रवाना हो जाते है। “बार हेडेड गुज” के आने जाने का यह सिलसिला पिछले 10-12 दिनों से चल रहा है और आगे भी लगभग 10 दिन और रहेगा। जलाशय के आसपास पक्षी प्रेमी इनकी अटखेलियों का आनन्द ले रहे है और उनकी गतिविधियों को अपने कैमरे में कैद कर रहे है। “बार हेडेड गुज” या “राजहंस” वो पक्षी है जो हिमालय के उस पार मंगोलिया, कजाकिस्तान, रसिया जैसे देशों में पाए जाते है है।

शर्दी का मौसम शुरू होते ही ये पक्षियां अनुकूल मौसम और भोजन की तलाश में भारत की ओर पलायन करते है और करोड़ों की संख्या में ये पक्षी देश के अलग-अलग क्षेत्रों के जलाशयों में अपना डेरा जमाते है। लगभग चार महीने प्रवास पर रहने के बाद यहां गर्मी शुरू होते ही वापस लौट जाते है। अभी उनके लौटने का समय है। “बार हेडेड गुज” के बारे में कहा जाता है कि ये 27 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ने में सक्षम है और ज्यादातर जलाशयों में उगे घांस के बीच घोसला बनाकर रहते है। “बार हेडेड गुज” के बारे में माना जाता है कि ये दिनभर में 16 सौ किलो मीटर की दूरी तय कर लेता है।
00 2016 में दिखा था टैगिंग किया हुआ पक्षी
“बार हेडेड गुज” की एक तस्वीर 2016 में वाईल्ड लाइफ फोटोग्राफर शिरीष डामरे ने घोंघा जलाशय से लिया था। पक्षी के गले मे टेग लगा था जिसे मंगोलिया के शोधकर्ता रॉबर्ट थॉमसन ने लगाया था। शिरीष डामरे का कहना की टेग लगने के बाद यह पक्षी 2010 से लेकर 2014 तक कर्नाटक में था। मंगोलिया वापस जाते समय यह कुछ दिन के लिए घोंघा जलाशय में रुका था। तब उसने ये तस्वीर लिया था।

सभी फोटो वाईल्ड लाइफ फोटो ग्राफर सत्यप्रकाश पांडेय,
अंतिम फोटो शिरीष डामरे
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