कोयला घोटाला : कटघरे में EOW, पहले से तैयार बयान कोर्ट में पेश करके फंसे अधिकारी, कोर्ट ने जारी किया नोटिस

रायपुर। कोयला घोटाला में रायपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने EOW डायरेक्ट अमरेश मिश्रा और विभाग के ASP और DSP को नोटिस जारी किया है। EOW ने मजिस्ट्रेट के सामने आरोपी निखिल चंद्राकर का बयान दर्ज कराने के बजाय पहले से तैयार और टाइप किया हुआ बयान कोर्ट में पेश कर दिया। इस पर कोर्ट ने EOW-ACB के निदेशक अमरेश मिश्रा से जवाब मांगा है।
रायपुर की स्पेशल कोर्ट में कोयला घोटाला के मुख्य आरोपी सूर्यकांत तिवारी की जमानत याचिका पर सुनवाई चल रही थी। इसी दौरान कोर्ट में पहले से टाइप्ड बयान वाले दस्तावेज पेश कर दिए। सूर्यकांत तिवारी के वकीलों ने इसका विरोध किया। हाईकोर्ट में भी EOW-ACB की शिकायत की गई है। इसके बाद रायपुर के कोर्ट ने EOW-ACB के निदेशक अमरेश मिश्रा, उप पुलिस अधीक्षक राहुल शर्मा और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक चंद्रेश ठाकुर को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने तीनों अफसरों से जवाब मांगा है। इसके तत्काल बाद पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी जांच एजेंसी पर सवाल उठाए हैं। भूपेश बघेल ने सोशल मीडिया पर लिखा कि अब जांच एजेंसियां झूठे बयान और सबूत खुद बनाने लगी हैं क्या ? किसी को भी फंसाने के लिए अब जांच एजेंसियां सुपारी ले रही हैं क्या ? जांच एजेंसी EOW/ACB पर झूठे साक्ष्य बनाकर अदालत के साथ आपराधिक धोखाधड़ी की शिकायत बेहद गंभीर है।
दरअसल, कोल घोटाले (केस नंबर 02/2024 और 03/2024) में आरोपी सूर्यकांत तिवारी की जमानत पर सुनवाई हो रही थी। इस दौरान EOW/ACB (EOW/ACB) ने कोर्ट में कुछ दस्तावेज पेश किए। इन दस्तावेजों में सह आरोपी निखिल चंद्राकर का बयान भी शामिल था, जिसे EOW ने कोर्ट को धारा 164 के तहत रिकॉर्ड किया गया बताया।
शिकायतकर्ता गिरीश देवांगन के मुताबिक कोर्ट में जब निखिल चंद्राकर के बयान की कॉपी सूर्यकांत तिवारी के वकीलों को दी गई, तो उसमें कई गड़बड़ियां सामने आईं। इससे EOW/ACB पर झूठे तरीके से साजिश रचने का शक हुआ।
गिरीश देवांगन के मुताबिक बयान की जो प्रति कोर्ट को दी गई वह उस भाषा में नहीं है जो आमतौर पर कोर्ट में इस्तेमाल होती है। उसमें जो फॉन्ट इस्तेमाल हुआ है, वह भी कोर्ट में इस्तेमाल होने वाला फॉन्ट नहीं है। वह फॉन्ट तो छत्तीसगढ़ की अदालतों में कभी उपयोग में लाया ही नहीं जाता।
गिरीश देवांगन ने आरोप लगाया कि EOW की गड़बड़ियों से साफ जाहिर होता है कि बयान कोर्ट में नहीं बल्कि बाहर किसी कंप्यूटर पर तैयार किया गया, फिर उसे पेनड्राइव में लाकर कोर्ट में जमा कर दिया गया। मजिस्ट्रेट के सामने निखिल चंद्राकर का बयान दर्ज नहीं कराया गया, बल्कि बाहर तैयार की गई फाइल को ही उसका बयान बताकर जमा कर दिया गया।
शिकायतकर्ता गिरीश देवांगन ने कहा कि इस तरह की गड़बड़ी से स्पष्ट है कि ईओडब्लू/एसीबी ने दस्तावेजों की कूटरचना (फर्जीवाड़ा) की है। इसलिए इस मामले की गंभीरता से जांच कर जरूरी कार्रवाई की मांग की जा रही है।
कानूनी तौर पर यह प्रक्रिया न्यायालयीन नियमों का घोर उल्लंघन है। इस खुलासे के बाद यह सवाल उठ गया कि अगर जांच एजेंसियां इस तरह बयान तैयार करेंगी, तो निष्पक्ष जांच और न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है ?

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नीरजधर दीवान /संपादक - मोबाइल नंबर 8085229794
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