बिलासपुर। मिसेज इंडिया इंटरनेशनल क्वीन “एल्यूरिंग” 2026 का ताज अपने नाम करने वाली बिलासपुर की बेटी और बहु एंजेल चौकसे का कहना है कि यह सम्मान मेरा व्यक्तिगत सम्मान नहीं है, बल्कि पूरे बिलासपुर और छत्तीसगढ़ की जनता का सम्मान है। यहां तक पहुंचने के लिए पति, सास और ससुर का मुझे भरपूर सहयोग मिला। उनके सहयोग के बिना यह सम्मान असंभव था।

शहर के एक होटल में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में एंजल ने बताया कि दिल्ली के होटल लीला इंटरनेशनल में आयोजित एक प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में मुझे भाग लेने का अवसर मिला। यह मेरे जीवन का केवल एक मंच नहीं था, बल्कि वर्षों से सजाए एक सपने को साकार करने की यात्रा थी। बहुत कम लोग जानते हैं कि कॉलेज के दिनों से ही मेरी रुचि फैशन और पर्सनैलिटी डेवलपमेंट के क्षेत्र में रही है। मैं होम साइंस की छात्रा थी और उसी दौरान मैंने अपने कॉलेज की ब्यूटी प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था। तब मुझे ‘Miss Home Science’ का खिताब मिला था। तभी से मेरे मन में यह सपना था कि मैं इस क्षेत्र में आगे बढूं और एक बड़ा मंच हासिल करूँ। लेकिन विवाह के बाद मेरी जिम्मेदारियां बढ़ गई। परिवार, घर-गृहस्थी और जिम्मेदारियों के बीच मेरा यह सपना कहीं पीछे छूट गया। हालांकि मेरे पति और परिवार ने कभी भी मेरे सपनों को मरने नहीं दिया। उन्होंने हमेशा मुझ पर विश्वास किया, मुझे प्रेरित किया और हर कदम पर मेरा हौसला बढ़ाया। उन्हीं के विश्वास ने मुझे एक बार फिर अपने सपने को जीने की ताकत दी।
पिछले लगभग एक वर्ष से मैं इस प्रतियोगिता की तैयारी कर रही थी। 42 वर्ष की उम्र में इस स्तर की प्रतियोगिता में उतरना आसान नहीं था। इस प्रतियोगिता ने मुझे केवल एक ताज ही नहीं दिया, बल्कि जीवन के कई महत्वपूर्ण अनुभव भी दिए। अलग-अलग देशों से आई प्रतिभागियों की संस्कृति, सोच, आत्मविश्वास और जीवनशैली को करीब से जानने और उनसे सीखने का अवसर मिला। यह अनुभव मेरे लिए अमूल्य है। कहा मैं एंजेल चौकसे, बिलासपुर की निवासी हूँ। मेरा परिवार मेरे जीवन की सबसे बड़ी ताकत है। मेरे पति रितेश चौकसे, मेरी 21 वर्षीय बेटी विनस चौकसे, जो वर्तमान में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रही हैं, मेरे माता-पिता एवं सास-ससुर- हम सभी एक संयुक्त परिवार में साथ रहते हैं। आज मैं जिस मुकाम पर खड़ी हूँ, उसके पीछे मेरे पूरे परिवार का त्याग, विश्वास और निरंतर सहयोग शामिल है।
उन्होंने कहा मुझे अत्यंत गर्व और प्रसन्नता है कि इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में मुझे यह सम्मान केवल मेरा व्यक्तिगत सम्मान नहीं है, बल्कि पूरे बिलासपुर और छत्तीसगढ़ की जनता का सम्मान है। मुझे गर्व है कि मुझे अपने शहर का नाम रोशन करने का अवसर मिला। यह सम्मान केवल मेरा व्यक्तिगत सम्मान नहीं है, बल्कि पूरे बिलासपुर और छत्तीसगढ़ का सम्मान है। मुझे गर्व है कि मैंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने शहर बिलासपुर का नाम रोशन करने का एक छोटा-सा प्रयास किया है। मैं विशेष रूप से अपने पति रितेश चौकसे, अपनी बेटी विनस चौकसे, अपने माता-पिता, सास-ससुर, परिवार के सभी सदस्यों, अपने मित्रों, शुभचिंतकों, प्रशिक्षकों और उन सभी लोगों का आभार व्यक्त करती हूँ। जिन्होंने हर परिस्थिति में मेरा साथ दिया। यदि उनका विश्वास और सहयोग नहीं होता, तो शायद मैं आज यहाँ तक नहीं पहुँच पाती। मैं बिलासपुर और छत्तीसगढ़ की सभी महिलाओं और बेटियों से यही कहना चाहती हूँ कि सपनों की कोई उम्र नहीं होती। यदि आपके भीतर जुनून, मेहनत और आत्मविश्वास है, तो जीवन के किसी भी पड़ाव पर अपने सपनों को साकार किया जा सकता है। परिवार और जिम्मेदारियाँ हमारी ताकत बन सकती हैं, यदि हम उन्हें अपने सपनों का साथी बना लें।
अंतरराष्ट्रीय स्तर की इस प्रतियोगिता में भाग लेकर एंजेल चौकसे ने न केवल खिताब जीता, बल्कि विभिन्न देशों से आईं प्रतिभागियों की संस्कृति, सोच और जीवनशैली को करीब से समझा। अपनी इस उपलब्धि पर खुशी जाहिर करते हुए एंजेल ने कहा यह सम्मान केवल मेरा व्यक्तिगत सम्मान नहीं है, बल्कि पूरे बिलासपुर और छत्तीसगढ़ की जनता का सम्मान है। मुझे गर्व है कि मुझे अपने शहर का नाम रोशन करने का अवसर मिला।
सपनों की कोई उम्र नहीं होती – अपनी इस ऐतिहासिक सफलता के बाद एंजेल चौकसे ने बिलासपुर और प्रदेश की महिलाओं व बेटियों के नाम एक बेहद खास और प्रेरणादायक संदेश दिया। उन्होंने कहा सपनों की कोई उम्र नहीं होती। यदि आपके भीतर जुनून, कड़ी मेहनत और अटूट आत्मविश्वास है, तो आप जीवन के किसी भी पड़ाव पर अपने सपनों को साकार कर सकती हैं। परिवार और जिम्मेदारियाँ हमारी कमजोरी नहीं, बल्कि हमारी सबसे बड़ी ताकत बन सकती हैं। बस हमें उन्हें अपने सपनों का साथी बनाना सीखना होगा।
अपनी इस उपलब्धि का श्रेय एंजेल ने अपने पति रितेश चौकसे, बेटी विनस चौकसे, माता-पिता, सास-ससुर और पूरे परिवार के सहयोग को दिया। उन्होंने कहा कि परिवार के अटूट विश्वास, ट्रेनर्स के मार्गदर्शन और शुभचिंतकों की प्रार्थनाओं के बिना यह मुकाम पाना संभव नहीं था।
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