बिलासपुर। अचानकमार टाइगर रिजर्व में बाघिन के हमले से एक 25 वर्षीय युवक की मौत हो गई है। युवक करील निकलने के लिए जंगल में घुसा था। बाघिन अपने दो शावकों के साथ घूम रही थी तभी सामने युवक दिख गया और उस पर हमला कर दिया। युवक के शव को जोगीपुर के जंगल से बरामद किया गया है। इस घटना ने वन विभाग की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर दिए है। सवाल ये है कि क्या विभाग को बाघिन के मूवमेंट की जानकारी नहीं थी ? यदि जानकारी थी तो क्या आसपास की बस्तियों में मुनादी कराई गई ? या फिर विभाग के अधिकारी ऑफिस में बैठकर विभाग चला रहे है।
मिली जानकारी के अनुसार ग्राम बांधा निवासी धरम दास घृतलहरे (25) जंगल में करिल काटने और पीहरी लेने गया था। इसी दौरान शेरनी ने उस पर हमला कर दिया। शेरनी ने हमले में युवक की गर्दन को अपने पंजे से फाड़ दिया। जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। बताया जा रहा है कि जिस क्षेत्र में युवक करील काटने गया था, वहां शेरनी पिछले महीने भर से अपने शावकों के साथ घूम रही है। करिल काटते काटते युवक शेरनी के इतने करीब पहुंच गया कि उसे अपने शावकों की जान खतरे में पड़ती नजर आई होगी। यही कारण है शावकों को बचाने के लिए शेरनी ने युवक पर हमला कर दिया। बता दे वन्यप्राणि किसी मनुष्य पर हमला तभी करते है जब जान खतरे पड़ने का डर हो जाए या फिर भयंकर भूख लगी हो।
हालांकि घटना की सूचना मिलते ही जुनापारा पुलिस और वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची। टीम ने एटीआर रेंज के जोगीपुर जंगल क्षेत्र से युवक का शव बरामद किया। शव को पोस्टमार्टम के लिए लोरमी स्वास्थ्य केंद्र भेजा गया है। हमले के बाद वन विभाग ने ग्रामीणों से जंगल क्षेत्र में नहीं जाने और सतर्कता बरतने की अपील की है। लेकिन इस घटना ने वन विभाग को कटघरे में खड़ा कर दिया है। बता दे प्रदेश की सरकार छत्तीसगढ़ के जंगलों में बाघों का कुनबा बढ़ाने के लिए करोड़ो रूपए खर्च कर रही है। विभाग के हर अधिकारियों को जंगल में मौजूद बाघों के हर मूवमेंट पर नजर रखने के लिए कहा गया है। इसका एक ही मकशद है कि शिकारी उन तक नहीं पहुंच पाए। इसके अलाव जन्म लेने वाले शावक और उसकी मां को कोई नुकसान न हो। वन विभाग के कार्य में इस बात को प्रमुखता दी जाती है कि कहीं बाघ और बाघिन दिखे तो आसपास की बस्तियों में मुनादी करके उन्हें जंगल में जाने से रोके, ग्रामीणों को सचेत करें। इसके लिए जंगल विभाग में सैकड़ों अधिकारी और कर्मचारियों को तैनात किया गया है। लेकिन इस घटना से स्पष्ट है कि वन विभाग के अधिकारी बेहद लापरवाह है। उन्हें जंगल में क्या हो रहा है इसकी जानकारी नहीं है। केवल अपने वेतन और नजराना पर ज्यादा ध्यान है। अधिकारियों को न तो जंगल से मतलब है और न हो वन्य प्राणियों से से मतलब है। यदि इन्हें मतलब रहता तो ये घटना नहीं होती। स्पष्ट हो रहा है कि वन विभाग को शेरनी और उनके शावकों के मूवमेंट की जानकारी नहीं थी। यदि रहती तो बस्तियों में मुनादी कराते और ग्रामीणों को जंगल में घुसने से रोकते। लेकिन ग्रामीण न केवल जंगल में घुसे.. करिल भी काट रहे है और पीहरी भी निकाल रहे है।
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