ऐसे समझें प्रधानमंत्री आवास योजना की राजनीति को…, सत्ता बदलते ही आबंटन कर दिया तीन गुना…ताकि राज्यांश न दे सके सरकार..

बिलासपुर। प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर भाजपा और कांग्रेस सरकार के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर जरूर शुरू हो गया है। लेकिन पिछली सरकार और वर्तमान सरकार के आंकड़ों से स्पष्ट है कि योजना को लेकर सुनियोजित राजनीति हो रही है। पिछली सरकार की तुलना में केंद्र सरकार ने आवास का आबंटन तीन गुना बढ़ा दिया है। ताकि कांग्रेस सरकार राज्यांश के भार से दब जाए और गरीबों को लेकर जमकर राजनीति की जा सके।

पीएम आवास योजना के 7 लाख 81 हजार से ज्यादा आवास केंद्र ने वापस लिए, तो राज्य की सियासत में बखेड़ा शुरू हो गया। आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह से लेकर भाजपा के सभी छोटे-बड़े नेता मुख्यमंत्री पर पिल पड़े। सांसद अरुण साव ने तो संसद में सवालों की झड़ी लगा दी। बीजेपी ने सरकार पर सवालों की झड़ी लगाते हुए यहां तक कह दिया कि सरकार की लापरवाही से गरीबों के घर अब नहीं बन पाएंगे। कहा गया गरीबों को मकान से वंचित करने का पाप किया जा रहा है। अब आंकड़ों में समझते हैं, दरअसल मामला है क्या ? केंद्र सरकार ने 7 लाख 81 हजार 999 आवास वापस लिए। 1 लाख 20 हजार रुपए प्रति आवास की दर से कुल राशि 9 हजार 383 करोड़ रुपए होती है। अब इसमें केंद्र सरकार की ओर से दिए जाने वाला केन्द्रांश 72 हजार रुपए प्रति आवास के हिसाब से गणना करें, तो कुल 5 हजार 630 करोड़ रुपए होते हैं। राज्य को प्रति आवास 48 हजार रूपए राज्यांश के रूप में देने थे। कुल आबंटित आवास यानी 7 लाख 81 हजार 999 के अनुपात में राज्यांश करीब 3 हजार 750 करोड़ रुपए होता है। अब जरा मनरेगा का हिसाब जोड़ लें। एक आवास के काम के लिए यदि 90 मेनडेज कार्य मिलता है। लगभग 18 हजार प्रति आवास के अनुपात में गणना की जाए, तो 7 लाख 81 हजार 999 कुल आवास के हिसाब से करीब 1407 करोड़ रुपए होते हैं। इनमें शौचालय निर्माण के लिए 938 करोड़ रूपए जोड़ दिया जाए, तो 11 हजार 728 करोड़ रुपए की एक बड़ी राशि होती है। केंद्र ने 2021-22 के लिए आबंटित इन मकानों को वापस ले लिया है। इधर आवास वापस लिए जाने के केंद्र के फैसले पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा कि अगर प्रधानमंत्री के नाम से योजना है, तो केंद्र का योगदान 90 फीसदी और राज्य का 10 फीसदी होना चाहिए ना कि 60-40 होना चाहिए। बहरहाल गरीबों के आवास बनते तो 11 हजार करोड़ रूपए से ज्यादा मार्केट में आता, सैकड़ों को रोजगार मिलता। सरकार को 18 फीसदी जीएसटी अलग। लेकिन प्रदेश सत्ता परिवर्तन के साथ आवास योजना में राजनीति भी शुरू हो गया। जब 2019 में कांग्रेस की सरकार बनी तो सुनियोजित तरीके से आवास का आबंटन तीन गुना बढ़ा दिया। जब योजना शुरू हुई तो पहला आबंटन 2016 में आया, तब प्रदेश में भाजपा की सरकार थी। साल 2016-17 में मात्र 2 लाख 36 हजार 363 आवास बने। इसी तरह साल 2017-18 में 2 लाख 900 आवास का ही निर्माण कराया गया था। वर्ष 2018-19 में भी 3 लाख 25 हजार 2012 मकान बनाने की स्वीकृति दी गई थी। तब भजपा के लोग प्रदेश में चौथी पारी खेलने के लिए पूरी तरह से आस्वस्थ थे। इसके बाद भी भाजपा की सरकार ने महज 69 हजार 365 मकान बना पाए। जब 2019 में कांग्रेस की सरकार बनी तो केंद्र सरकार ने आवास योजना के आबंटन में छत्तीसगढ़ को तीन गुना से भी ज्यादा आवास बनाने का जिम्मा दे दिया गया। इससे स्वाभाविक रूप से राज्यांश भी तीन गुनी हो गई और सरकार आर्थिक दबाव में आ गई। एकाएक किसी योजना के लिए तीन गुना राशि की ब्यवस्था करना किसी भी राज्य सरकार के लिए मुश्किल काम है। क्योंकि राज्य सरकार की भी अपनी योजनाओं के लिए बजट देना होता है।

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नीरजधर दीवान /संपादक - मोबाइल नंबर 8085229794
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