बिलासपुर। भारतीय जनता पार्टी ने एक झटके के साथ छत्तीसगढ़ में प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय और नेता प्रतिपक्ष धरम लाल कौशिक को बदलकर अरुण साव और नारायण चंदेल की ताजपोशी कर दी है। हालांकि इसकी चर्चा लंबे समय से चल रही थी। अब इस बदलाव को लेकर कयासों का दौर भी शुरू हो गया है। यही नहीं छत्तीसगढ़ में भविष्य की राजनीति कैसी होगी इसको लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। दरअसल भाजपा इस बदलाव के पहले कई मुद्दों को लेकर लिटमस टेस्ट कर चुकी है। सबसे पहले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पिता नंदकुमार बघेल के बयानों को लेकर उन्हें ब्राम्हण विरोधी बताने का प्रयास किया गया, फिर कवर्धा के मामले को लेकर हिंदू_मुस्लिम के मुद्दे को गरमाने की कोशिश हुई, इसके बाद छिटपुट हो रहे धर्मांतरण को भी मुद्दा बनाने का प्रयास किया गया। लेकिन सारे मुद्दे भूपेश बघेल के किसान हितैसी छवि के सामने ध्वस्त हो गए, उनके काम के सामने टिक नहीं सके। भाजपा के नेताओं को समझ ही आ रहा था की भूपेश बघेल को किस मुद्दे पर घेरा जाए। यही नहीं भाजपा के सारे स्थापित दिग्गज नेता भी भूपेश के सामने पीटते गए। उनके सामने दूसरी समस्या यह भी थी भाजपा के स्थापित नेता जनता के बीच तो दूर की बात है अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच खड़ा हो पाने की स्थिति में नहीं थे। दूसरी ओर भूपेश बघेल ने किसानों का कर्जा माफ करके, ढाई हजार रुपए क्विंटल में धान खरीदी करके जहां किसान हितैसी मुख्यमंत्री के रूप में अपनी पहचान बना चुके है तो वनवासी क्षेत्रों में वनोपज की अच्छी कीमत देकर आदिवासियों को भी अपना मुरीद बना लिया है। रही_सही कसर राम वन गमनपथ योजना, गौमूत्र और गोबर खरीदी ने पूरी कर दी है। इसके अलावा स्वामी आत्मानंद के नाम पर अंग्रेजी स्कूल खोलकर अपनी प्रोग्रेसिव सोच को भी साबित कर दिया। छत्तीसगढ़ की संस्कृति, तीज त्यौहार को बढ़ावा देकर छत्तीसगढ़ियावाद को हवा देकर प्रदेश में राजनीति की दिशा ही बदल दी है। जब भाजपा और उसके नेता चारों तरफ से पिट रहे है तब भाजपा ने प्रदेश अध्यक्ष बदलकर साहू बनाम कुर्मी की राजनीति खेलने का नया दांव चला है। क्योंकि प्रदेश में साहू और कर्मियों का वोट बैंक लगभग समानांतर है। भाजपा इसके माध्यम से भूपेश बघेल की किसान हितैषी छवि को डायलूट करके पूरा फोकस साहू बनाम कुर्मी आधारित राजनीति करने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। अरुण साव के अध्यक्ष बनने से भाजपा साहू वोट बैंक के बिखराव को भी रोकना चाहती है। क्योंकि बहुतायत साहू समाज के वोटर भाजपा से जुड़ाव रखते है। लेकिन भूपेश बघेल की कार्यशैली से साहू वोट बैंक का तेजी से बिखराव हो रहा था और साहू समाज की नई_पुरानी पीढ़ी कांग्रेस की ओर पलायन कर रही थी। आपको बता दे छत्तिसगढ़िया और गैर छत्तीसगढ़िया के मुद्दे को लेकर साहू समाज बेहद आक्रामक है। भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही अन्य कामों के अलावा इसी मुद्दे को सबसे ज्यादा हवा दी है। क्योंकि भूपेश बघेल ये अच्छे से जानते है की साहू और कुर्मी वोट एक छतरी के नीचे आ गए तो उनके पुरखों ने जो छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़िया नेतृत का सपना देखा था वह स्थाई रूप से साकार हो सकता है। यही कारण है की साहू समाज के लोग तेजी से कांग्रेस के तरफ खिंचे चले जा रहे थे। अरुण साव की ताजपोशी इसी बिखराव को रोकने के लिए किया गया है। संभव है की चुनाव नजदीक आते आते पार्टी उन्हे मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में प्रोजेक्ट करे तो ये अतिसंयोक्ति नहीं होगी।
फिलहाल प्रदेश की जनता साहू बनाम कर्मी की राजनीति का सामना करने के लिए तैयार रहे। राजनीति तो होती रहेगी, सत्ता आती_जाती रहती है। लेकिन राजनीति के कारण दो समाजों के बीच कटुता न फैले इस बात का ध्यान रखा जाए। क्योंकि छत्तीसगढ़ का माहौल सामाजिक समरसता का रहा है कटुता का नहीं।
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