बिलासपुर। छत्तीसगढ़ बिलासा साहित्य मंच ने खुले प्रेम पर खुली चर्चा विषय पर संगोष्ठी आयोजित की। इस दौरान कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अटल बिहारी बाजपेयी यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. अरूण दिवाकर नाथ बाजपेयी रहे। सेंट्रल यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो.देवेंद्र नाथ सिंह मुख्य वक्ता रहे। प्रो.बाजपेयी ने गालिब के शेर ये इश्क नहीं आसान, बस इतना समझ लीजिए…को याद करते हुए अपनी बात रखी। डॉ.सिंह ने कहा कि प्रेम के टूटने में कोई बेवफाई नहीं होती। यह कई कारणों से टूट जाता है। समाज में रोज कई रिश्तों को लेकर ठगी हो रही है लेकिन जब प्रेम के रिश्ते में ऐसा होता है तो उसे उदाहरण के तौर पर पेश किया जाता है जो कि ठीक नहीं है। इससे हम जीवन में प्रेम को वंचित करते हैं। प्रेम जीवन का ऐसा हिस्सा होता है जिसकी हमारे घर में जगह नहीं होती। हर आदमी को अपना प्रेम महान लगता है लेकिन दूसरे का प्रेम वासना लगता है। शादी के लिए उम्र और जाति की जरूरत पड़ती है लेकिन प्रेम इससे परे होता है। मुक्तिबोध की कविता है-पता नहीं कब कौन कहां किस ओर मिले, किस सांझ मिले, किस सुबह मिले, यह राज जिंदगी की जिससे जिस जगह मिले। इंडियन कॉफी हाउस में आयोजित संगोष्ठि में वरिष्ठ साहित्यकार रामकुमार तिवारी ने कहा कि उसने कहा था कहानी का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रेम वहीं है जो हमें उद्दात बनाए। जब प्रेम घटित होती है तो अभिव्यक्त नहीं होती, प्रदर्शित नहीं होती। यदि ऐसा हो रहा है तो वह प्रेम नहीं है। प्रेम हर स्टेज का अलग-अलग होता है। दांपत्य में बाद में पति-पत्नी गहरे प्रेमी हो जाते हैं। कई बार जिसके साथ प्रेममय दिखते हैं, उसके साथ बिलगाव पैदा होता है। प्रेम की अवस्थाएं अनुभूति की है। केवल कृष्ण पाठक ने कहा कि प्रेम को परिभाषित करना मुश्किल है लेकिन जब इसे परिभाषित किया जाता है तो वाणी मौन हो जाती है। जब महसूस करते हैं तो अनंत की अनुभूति होती है, वह ईश्वर की ओर चली जाती है। लता मिश्रा ने कहा कि प्रेम हमेशा त्याग चाहता है। प्रेम चाहे किसी से भी हो लेकिन वह वासनारहित होता है। आज कल प्रेम और वासना को मिलाया जा रहा है। लोगों ने प्रेम का स्वरूप ही वासना को दे दिया है। ये सबसे बड़ी समस्या है। साहित्यकार देवधर महंत ने कहा कि प्रेम अपरिभाषीय है। प्रेम आदर्श, वासनारहित और विशुद्ध होता है। प्रेम धीरे-धीरे आध्यात्म की ओर चल देता है। आफताफ और श्रद्धा के बीच प्रेम नहीं था। उसे प्रेम नहीं कह सकते। वह आकर्षण या भटकाव हो सकता है। आजकल की पीढ़ी जिसे प्रेम समझती है, वह आकर्षण है। राकेश पांडेय ने कहा कि युवा पीढ़ी प्रेम और देह में अंतर नहीं समझ पा रही है। प्रेम में पाने की लालसा नहीं होती। सीयू के पत्रकारिता विभाग की प्रोफेसर डॉ.अमिता और उनके पति ने कहा कि प्रेम स्वार्थ और नि:स्वार्थ की धूरी पर कभी ऊपर कभी नीचे होता आ रहा है। वर्तमान पीढ़ी स्वार्थप्रेम पर टिका हुआ है। नए साहित्य व नई फिल्में किस तरह का संदेश दे रही हैं। अभी जो प्रेम है वह महज आकर्षण है। प्रेम में हम सामने वाले की खुशी देखते हैं। नहीं देखते कि खुद का क्या नुकसान होगा। उज्मा अख्तर ने कहा कि अभी मोहब्बत के नाम पर कुछ और ही हो रहा है। इसमें आखिर में रुसवाई के अलावा और कुछ नहीं मिलता। इस दौरान गीतकार अजय पाठक, जावेद अली, शाजिया अली, जीडी पटेल, व्हीव्ही रमणा किरण, सुनील शर्मा,संजय पांडेय आदि मौजूद थे।
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