बिलासपुर। मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर पिछले सालभर से उठापटक चल रही है। हर बार एक तारीख आती है शपथ ग्रहण की और ठीक एक दिन पहले खबर आती है कि मंत्री मंडल का विस्तार टल गया है। अब सवाल ये उठ रहा है कि आखिर मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर इतनी हायतौबा क्यों मची हुई है ? छत्तीसगढ़ में तीन मंत्री बन भी गए तो क्या बदल जाएगा ? सरकार तो दो साल से चल ही रही है !
जी हां ये सवाल बहुत से लोगों को चुभ सकता है। विशेषकर जो मंत्री बनने का सपना देख रहे उन्हें और जो उनके चंगुमंगू है उन्हें ? क्योंकि मंत्री बनने और नहीं बनने और नहीं बनने से सीधा उनका हित जुड़ा हुआ है, लेकिन सवाल तो बनता है। की आखिर तीन नए मंत्री बन गए तो छत्तीसगढ़ में क्या बदल जाएगा ? क्या क्रांतिकारी बदलाव हो जाएंगे ? क्या तीन और मंत्री बन गए तो अधिकारी दिन रात काम करने लगेंगे ? क्या प्रदेश से कमीशनखोरी बंद हो जाएगी ? क्या सड़कें, सरकारी बिल्डिंगे और नदियों में बन बराज, डैम और एनीकेट रातोरात तैयार हो जाएंगे ? क्या दोपहर 12 बजे के बाद ऑफिस पहुंचने वाले अधिकारी और कर्मचारी 10 बजे ऑफिस पहुंचने लगेंगे ? क्या स्कूलों में शिक्षक ईमानदारी से पढ़ाने लगेंगे ? क्या राजस्व विभाग में नामांतरण, बटांकन, सीमांकन जैसे छोटे छोटे कामों के लिए लोगों को भटकना नहीं पड़ेगा ? क्या विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार बंद हो जाएंगे ? यदि हां… तो फिर इन्हें मंत्री क्यों बनाना… सीधे मुख्यमंत्री बनाना चाहिए। ताकि इतने प्रतिभाशाली और चमत्कारिक प्रदर्शन करने वाले जनप्रतिनिधियों का लाभ पूरे छत्तीसगढ़ को मिल सके। इनकी प्रतिभा को कुछ विभाग तक सीमित रखना जनता के साथ अन्याय होगा। ऐसे लोगों को मुख्यमंत्री बनाकर सभी सरकारी विभागों के काम काज में चमत्कारिक परिणाम देकर प्रदेश को विकसित स्टेट की श्रेणी में लाना चाहिए। इनकी प्रतिभा का लाभ पूरे प्रदेश की जनता को दिलाना चाहिए। यदि तीन नए मंत्री बनने के बाद भी व्यवस्था नहीं सुधरने वाली है ? सरकारी कामकाज वैसे ही चलना है जैसे अभी चल रहा है तो मंत्रिमंडल के विस्तार का कोई औचित्य नहीं। बेवजह मंत्री बनाने का मतलब होगा सरकार पर… जनता पर… अतिरिक्त बोझ डालना। क्योंकि तीन नए मंत्री बनने के बाद सरकार को इनकी सुख सुविधाओं पर हर महीने लाखों रुपए खर्च करना पड़ेगा। नए मंत्रियों को बंगला देना ही पड़ेगा, गाड़ियों का पूरा काफिला देना पड़ेगा जिसमें वो सायरन बजाते हुए प्रदेशभर का दौरा करेंगे। केबिनेट मंत्री के हिसाब से सुरक्षा व्यवस्था करना ही पड़ेगा, कार्यालयीन कामों के लिए कम से कम दो दर्जन कर्मचारी देने ही पड़ेंगे। मंत्री के श्रीमती की सेवा करने के लिए महिला कर्मचारी रखना ही पड़ेगा। यदि उनके घर में छोटे बच्चे है तो उनकी देखभाल के लिए अलग आया रखनी ही पड़ेगी। बंगले में हरियाली बनी रहे इसके लिए माली देना ही पड़ेगा। कुल मिलाकर कई लाख रुपए इन मंत्रियों पर सरकार खर्च करेगी। जब व्यवस्था वैसे ही चलना है जैसे चल रही है तो जनता का पैसा क्यों बर्बाद करना ?
हां इतना जरूर है कि तीन नए मंत्री बनेंगे तो उनके आसपास घूमने वाले चंगु मंगुओं की चांदी जरूर हो जाएगी। मंत्रियों को मिलने वाले विभागों में उनका ठेका, समान सप्लाई का काम और ट्रांसफर – पोस्टिंग का धंधा जरूर चल निकलेगा। उनके कार्यकर्ता जरूर मौज करेंगे। दौरे में उनके साथ रहेंगे और मंत्री के साथ वे भी सरकारी सुख सुविधा का लाभ उठाएंगे। यदि यही सब करना है तो मंत्री बनाया जा सकता है। लेकिन अब सवाल ये उठता है कि चुनिंदा लोगों को ही मंत्री क्यों बनाना ? हर विधायक के पीछे चार लोग घूमते है। उन्हें भी लगता है कि भैया मंत्री बनेंगे तो हम भी चांदी काट लेंगे ! आखिर उसने भी नेताजी जी जिताने के लिए पसीना बहाया है। लेकिन ऐसे लोगों के लिए फिर से बुरी खबर है। क्योंकि जो खबर आ रही है उसके अनुसार एक बार फिर से छत्तीसगढ़ में मंत्री मंडल का विस्तार अटक गया है। जो चूक रहे थे वो खुश है और जो बन रहे थे उनके हाथ एक बार फिर से मायूसी ही लगी है। बताया जा रहा है तीन लोगों के नाम तय थे और राज्यपाल से समय लेकर कभी भी शपथ ग्रहण हो सकती थी। लेकिन जो लोग मंत्री बनने से चूक रहे थे वे ज्यादा पावरफुल साबित हुए है। क्योंकि उनके कोपभाजन को बर्दाश्त कर पाना प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के बस की बात नहीं थी। यही कारण है कि अब तो नए मंत्री के लिए नेताओं और उनके समर्थकों को इंतजार करना पड़ेगा।
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