बिलासपुर। रेल प्रशासन को न तो हाईकोर्ट की परवाह है और न ही जिले के विधायकों की परवाह है। यही कारण है त्रिपुर सुंदरी मरिमाई मंदिर न्यू लोको कालोनी को आबंटित जमीन का लीज नवीनीकरण आज तक नहीं किया है। जबकि हाईकोर्ट को आदेश दिए तीन साल होने को है। इस बीच जिले के सभी विधायकों ने भी पत्र लिखकर लीज का नवीनीकरण करने का अनुरोध रेल प्रशासन से कर चुके है।
न्यू लोको कालोनी बिलासपुर में श्री सिद्धपीठ त्रिपुर सुंदरी मरिमाई माता मंदिर है जो 1907 से निर्मित है। इस प्राचीन मंदिर के लिए रेलवे बोर्ड ने 31.05.2006 एवं मंडल इंजिनियर सेटलमेंट बिलासपुर ने 13.06.2006. में 475.11 वर्ग मीटर जमीन लगभग 12 डिसमिल विधिवत आबंटित किया है। इस संबंध में मंदिर समिति और और रेलवे के बीच 01 अगस्त 2006 को अनुबंध किया गया है। अनुबंध के अनुसार मंदिर समिति ने रेलवे को मंदिर का नक्शा बनाकर जमा किया गया। समिति ने 30.05.2007 को DEN/HQ के नाम पर तीन प्रति नक्शा भी तैयार कर जमा कर दिया गया। लेकिन 26.07.2007 को रेलवे ने मंदिर समिति के अध्यक्ष/सचिव को पत्र के माध्यम से अवगल कराया कि समिति की ओर से जो नक्शा जमा किया गया है वह दो मंजिला है। यह नक्शा रेलवे के दिशा निर्देश के अनुसार नहीं है। इसके बाद मंदिर समिति ने 8 अक्टूबर 2007 को एक मंजिला नक्शा बनाकर रेलवे में जमा किया। इसके बाद रेलवे के अधिकारियों ने निर्माण करने की अनुमति दी। फिर समिति ने ज्योति कलश कक्ष का निर्माण कराया। इसके बाद समिति ने13 जनवरी 2015 को पुजारी आवास और भंडार कक्ष की मरम्मत करने की अनुमति मांगा। रेलवे ने इसके लिए भी अनुमति दे दी। इसी बीच किसी ने मंदिर परिसर में अवैध निर्माण करने की शिकायत कर दी। इसी दौरान जमीन की लीज समाप्त होने वाली थी तो मंदिर समिति ने 8 जुलाई 2016 को लीज नवीनीकरण के लिए आवेदन किया। रेलवे ने अवैध निर्माण हटाने के बाद ही लीज नवीनीकरण करने की शर्त रख दी। मंदिर समिति ने रेल प्रशासन के सामने जवाब प्रस्तुत किया लेकिन लीज का नवीनीकरण नहीं किया गया। इसके बाद मंदिर समिति ने हाईकोर्ट में याचिका पेश कर दी। हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद 7 नवंबर 2023 को आदेश दिया कि रेल प्रशासन दो माह के अंदर लीज का नवीनीकरण करे। लेकिन रेल प्रशासन द्वारा आज तक लीज का नवीनीकरण नहीं किया गया है। जबकि इस बीच जिले के मंत्री सभी विधायकों ने हाईकोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए लीज नवीनीकरण करने का अनुरोध रेल प्रशासन से कर चुके है। रेल प्रशासन को न तो हाईकोर्ट के आदेश की परवाह है और न ही जनप्रतिनिधियों के अनुरोध का परवाह है।
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