दानवीर भामाशाह सम्मान हेतु आवेदन आंमत्रित
बिलासपुर 28 सितम्बर 2021। दानवीर भामाशाह सम्मान हेतु दानशीलता, सौहार्द एवं अनुकरणीय सहायता प्रदान करने वाले उत्कृष्ट व्यक्ति अथवा संस्था की प्रविष्टियां आमंत्रित की गई है।
पुरस्कार के लिए आमंत्रित प्रविष्टियों में व्यक्ति अथवा संस्था का पूर्ण परिचय, छत्तीसगढ़ में निवासरत या कार्यरत हो, पिछला कार्य उत्कृष्ट हो और वर्तमान में भी निरंतर सक्रिय हो। दानशीलता एवं राष्ट्रीयता के क्षेत्र में किये गये कार्याें का विस्तृत विवरण, अन्य पुरस्कार प्राप्त किया हो तो उसका विवरण, उत्कृष्ट कार्याें के संबंध में प्रकाशन, प्रख्यात व्यक्तियों, पत्र पत्रिकाओं द्वारा की गई टिप्पणी, निरंतर क्रियाशील एवं निर्विवाद होने के विषय में जिला कलेक्टर की अनुशंसा, चयन होने की दशा में पुरस्कार ग्रहण करने की लिखित सहमति एवं पासपोर्ट साइज 03 फोटोग्राफस संलग्न करना होगा। पुरस्कार के लिए ज्यूरी के सदस्यों की प्रविष्टियां मान्य नहीं होगी।
इस संबंध में विस्तृत जानकारी के लिए व्यक्ति अथवा संस्था संयुक्त संचालक, समाज कल्याण जिला बिलासपुर कार्यालय में 10 अक्टूबर 2021 के पूर्व संपर्क कर सकते है।
00 भामा शाह कौन है जाने उनका जीवन
दानवीर भामाशाह का जन्म राजस्थान के मेवाड़ राज्य में वर्तमान पाली जिले के सादड़ी गांव में 28 जून 1547 को ओसवाल जैन परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम भारमल था जो रणथम्भौर के किलेदार थे।
भामाशाह का निष्ठापूर्ण सहयोग महाराणा प्रताप के जीवन में महत्वपूर्ण और निर्णायक साबित हुआ। मातृ-भूमि की रक्षा के लिए महाराणा प्रताप का सर्वस्व होम हो जाने के बाद भी उनके लक्ष्य को सर्वोपरि मानते हुए अपनी सम्पूर्ण धन-संपदा अर्पित कर दी। यह सहयोग तब दिया जब महाराणा प्रताप अपना अस्तित्व बनाए रखने के प्रयास में निराश होकर परिवार सहित पहाड़ियों में छिपते भटक रहे थे। मेवाड़ के अस्मिता की रक्षा के लिए दिल्ली गद्दी का प्रलोभन भी ठुकरा दिया। महाराणा प्रताप को दी गई उनकी हरसम्भव सहायता ने मेवाड़ के आत्म सम्मान एवं संघर्ष को नई दिशा दी।
भामाशाह अपनी दानवीरता के कारण इतिहास में अमर हो गए। भामाशाह के सहयोग ने ही महाराणा प्रताप को जहाँ संघर्ष की दिशा दी, वहीं मेवाड़ को भी आत्मसम्मान दिया। कहा जाता है कि जब महाराणा प्रताप अपने परिवार के साथ जंगलों में भटक रहे थे, तब भामाशाह ने अपनी सारी जमा पूंजी महाराणा को समर्पित कर दी। तब भामाशाह की दानशीलता के प्रसंग आसपास के इलाकों में बड़े उत्साह के साथ सुने और सुनाए जाते थे।
हल्दी घाटी के युद्ध में पराजित महाराणा प्रताप के लिए उन्होंने अपनी निजी सम्पत्ति में इतना धन दान दिया था कि जिससे २५००० सैनिकों का बारह वर्ष तक निर्वाह हो सकता था। प्राप्त सहयोग से महाराणा प्रताप में नया उत्साह उत्पन्न हुआ और उन्होंने पुन: सैन्य शक्ति संगठित कर मुगल शासकों को पराजित करा और फिर से मेवाड़ का राज्य प्राप्त किया।
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