बिलासपुर। 4 एकड़ पट्टे की जमीन बेचे जाने के मामले में एक नई बात सामने आ रही है। पटवारी, तहसीलदार और डायवर्सन शाखा के अधिकारियों ने जमीन दलाल के साथ मिलकर सरकार को स्टांप और पंजीयन शुल्क में भी चुना लगाया है। जब जमीन बेचने की बारी आई तो डावर्टेड जमीन को कृषि भूमि बता दिया गया।
जिले का कलेक्टर अपने AC चेंबर में बैठकर केवल बैठक लेने में ब्यस्त है जबकि राजस्व विभाग का मैदानी अमला सरकारी जमीन का बंदरबाट करके हर महीने करोड़ो का वारा न्यारा कर रहे है। दो दिन पहले democrecy.in ने मोपका में स्थित 992/9 के पट्टे की 4 एकड़ जमीन बेचे जाने का मामला प्रमुखता से प्रकाशित किया है। इस मामले में एक नई बात सामने आ रही है जिसमे पटवारी, तहसीलदार और डायवर्सन शाखा के अधिकारियों ने जमीन दलाल के साथ मिलकर सरकार को राजस्व की भी क्षति पहुंचाई है। पूरे मामले में जमीन माफियों ने डायवर्सन विभाग के साथ जुगलबन्दी कर चार एकड़ जमीन को 6 टुकडों में बेचकर शासन को करीब एक करोड़ 52 लाख रूयों का चुना लगाया है। डाइवर्टेट भूमि के पंजीयन के समय स्टाम्प शुल्क, उपकर एवं ब्लॉक मूल्य का निर्धारण वर्ग फुट के हिसाब से तय किया जाता है। विवादित भूमि का रकबा 1 लाख 74 हजार 240 वर्गफीट है और मोपका के न्यूनतम शासकीय मूल्य 600 रुपये वर्गफुट है। जिसके हिसाब से 10 करोड़ 45 लाख 44 हजार रुपये होता है जिसका स्टाम्प शुल्क एवं पंजीयन शुल्क 10 % के हिसाब से 1 करोड़ 4 लाख 54 हजार 400 रुपये होता है। लेकिन जमीन बेचते समय डाइवर्टेट भूमि को सुनियोजित तरीके से कृषि भूमि बताया गया और केवल 11 लाख 50 हजार 510 रुपये का स्टाम्प व पंजीयन शुल्क पटाया गया। ये पूरा खेल उस समय के पटवारी, नायब तहसीलदार और डाइवर्सन शाखा की मिली भगत से किया गया है।
दस्तावेजों के अवलोकन से मिली जानकारी के अनुसार नामांतरण पंजी खण्ड में सभी आदेश तात्कालीन तहसीलदार ने दिया है। लेकिन नामांतरण पंजी क्रमांक 834, 836 और 836 का नामातंरण आदेश किसी अज्ञात अधिकारी का है। हस्ताक्षर के साथ विभाग और पद का सील भी नही है। गौरतलब है कि मोपका स्थित खसरा नम्बर 992/9 शासकीय पट्टे की जमीन है। जमीन का पट्टा विमला के नाम कषि कार्य के लिए है। नियमानुसार पट्टाधारी से शपथ भी लिया गया है। शपथ में विमला ने बताया है कि जीविकोपार्जन के लिए इसके अलावा कोई जमीन उनके पास नहीं है। साल 2015 में पट्टाधारी ने राजस्व अधिकारियों के अलावा डायवर्सन शाखा और राजस्व अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर जमीन का डायवर्सन करवाया। तात्कालीन कलेक्टर ने डायवर्सन से इंकार कर दिया था। बावजूद इसके एडिश्नल जमीन का मद परिवर्तन किया गया। इसके बाद कमिश्नर कार्यालय से छलपूर्वक अहस्तांतरित शब्द भी हटावाया गया। साल 2019 में पट्टाधारी ने चार एकड़ जमीन को 6 टुकड़ों में कृषि भूमि बताकर अलग अलग लोगों को बेचा इस दौरान डायवर्सन विभाग का एक अधिकारी राजस्व कर्मचारी के साथ जमीन का निरीक्षण किया। रजिस्ट्री में जमीन को कषि योग्य होना बताया। दस्तावेज में हस्ताक्षर भी किया। फिर उसी अधिकारी ने नामांतरण पंजी में डायवर्टेड जमीन बताकर नामांतरण पंजी में भी हस्ताक्षर किया। इससे शासन को कुल एक करोड़ 51लाख रूपयों का नुकसान पहुंचा है।
00 पट्टे की जमीन को इन 6 लोगों ने खरीदा
1)अन्नू मसीह..पंजीयन क्रमांक 27/2/2020 रखबा 56 डिसिमिल..डायवर्सजन भूखण्ड क्रमांक 1242/2 खसरा नम्बर 992/9
2) सुनील सिंह..27/2/2020 रखबा 55 डिसिमिल..डायवर्सजन भूखण्ड क्रमांक 1242/3 खसरा नम्बर 992/9
3) ओमप्रकाश सिंह..पंजीयन क्रमांक 28/1/2021 रखबा 60 डिसिमिल..डायवर्सन भूखण्ड क्रमांक 1242/4 खसरा नम्बर 992/9
4) उत्तम प्रकाश सिंह पंजीयन क्रमांक 3/2/2021 रखबा 60 डिसिमिल..डायवर्सन भूखण्ड क्रमांक 1242/4 खसरा नम्बर 992/9
5) विनोद मिश्रा पंजीयन क्रमांक 17/2/2021 रखबा 59 डिसिमिल..डायवर्सन भूखण्ड क्रमांक 1242/6 खसरा नम्बर 992/9
6) किशन सिंह ..कुल खरीदी गयी जमीन एक एकड़ 10 डिसिमिल पंजीयन क्रमांक 27/2/2020 डायवर्सजन भूखण्ड क्रमांक 1242/ 10खसरा नम्बर 992/9 है।
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