बिलासपुर। अविभाजित बिलासपुर जिले के एक कद्दावर नेता ठाकुर धर्मजीत सिंह कल तक राजनीति के तिराहे पर खड़े थे। जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के एक फैसले ने एक राह तो हमेशा के बंद कर दिया। लेकिन अभी भी दुविधा कम नहीं हुई है। क्योंकि जोगी कांग्रेस से निकलकर उन्हें अब किस रास्ते से अपना आगे का सियासी सफर तय करना है, इसका निर्णय इतना आसान नहीं है। हालांकि नजदीकी लोगों की माने तो वे तय कर चुके है कि अब उन्हे किस राजनीति की कौन सी डगर पकड़नी है।
लोरमी विधायक ठाकुर धर्मजीत सिंह की पहचान एक शानदार वक्ता, मिलनसार और एक दिलेर जनप्रतिनिधि की रही है। यही कारण है की उनकी लोकप्रियता केवल लोरमी तक सीमित नहीं है। लोरमी के बाहर तखतपुर, मुंगेली, बिलासपुर, कोटा और बेलतरा तक उनकी लोकप्रिय फैली हुई है। सैकड़ों की संख्या में उनके चाहने वाले इन क्षेत्रों में भी मिल जाएंगे। लेकिन ये कद्दावर नेता अपनी सारी खूबियों के बाद भी पिछले कुछ सालों से हाशिए पर चल रहे है। पूर्व मुख्यमंत्री स्व अजीत जोगी के करीब होने का खामियाजा उन्हें लंबे समय तक भुगतना पड़ा। 2018 के विधानसभा चुनाव के पहले जब स्व जोगी ने अलग पार्टी बनाई तो वे कांग्रेस छोड़कर उनके साथ चले गए। बीते विधानसभा चुनाव में छजका ने जिन पांच सीटों पर फतह हासिल की, उनमें लोरमी सीट भी थी। लेकिन स्वर्गीय अजीत जोगी के निधन के बाद उनकी पार्टी में बिखराव शुरू हो गया। इधर ठाकुर धर्मजीत सिंह भी अपने राजनैतिक भविष्य को लेकर संभावनाएं तलाशने लगे। कभी वे कांग्रेस नेताओं के साथ कार्यक्रम में नजर आते तो कभी भाजपा नेताओं के साथ नजर आते। विधानसभा अध्यक्ष डॉ चरणदास महंत, पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा, स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव से उनके संबंध किसी से छिपे नहीं है। इसी तरह भाजपा नेताओं में पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह, पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल, अमर अग्रवाल जैसे नेताओं से भी उनकी नजदीकियां जगजाहिर हैं। कई बार वे डॉ रमन सिंह के साथ व्यक्तिगत रूप से मिलते जुलते रहे है। 2013 के विधानसभा चुनाव में उन्हें बिलासपुर से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव मिला था। लेकिन अमर अग्रवाल से बेहतर संबंधों के कारण बिलासपुर से चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया था। दोनो पार्टियों के नेताओं के साथ नजदीकी रिश्ते होने के कारण कभी उनके कांग्रेस में वापसी कि है तो कभी भाजपा में जाने की खबरे आती रही है। फिर कभी कभी यह भी खबरे आती रहती की टिकट पक्की नहीं होने के कारण वो छजका में ही रहेंगे। लेकिन रविवार को उन्हे छजका से निकालने की खबर के बाद एक बात तय हो गई है की वहां का दरवाजा उनके लिए बंद हो चुका है। अब उनके पास दो विकल्प बचे है एक तो ये की वो कांग्रेस में वापसी कर लें या फिर भाजपा ज्वाइन कर ले। लेकिन जानकारों की माने तो कांग्रेस में उनके जाने की संभावना नहीं के बराबर है। क्योंकि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से उनका व्यक्तिगत रूप से राजनैतिक अदावत है। लिहाजा उनके भाजपा में शामिल होने की संभावना ज्यादा है। उनके करीबियों की माने तो उनका भाजपा प्रवेश लगभग तय है। केवल सही वक्त का इंतजार है। और जब तक वह सही वक्त नहीं आ जाता तब तक अविभाजित बिलासपुर के इस कद्दावर नेता को दोराहे पर खड़ा होकर यह समझना होगा कि मौजूदा सियासी हालात में उनके लिए कौन सा रास्ता अधिक बेहतर होगा।
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