बिलासपुर। अपोलो हाॅस्पिटल बिलासपुर में जटिलतम काडीर्यक प्रोसीजर TAVR तकनीक से किया गया। TAVR एक ऐसी तकनीक जिसमें हृदय के वाल्व को बिना किसी सजर्री के बदला जाता है। सामान्यत हृदय के वाल्व को बदलने के लिये ओपन हार्ट सजर्री अथार्त छाती में एक बड़ा चीरा लगाया जाता है और सजर्री की जाती है। लेकिन अपोलो हाॅस्पिटल ने इस प्रक्रिया को छाती में चीरा लगाये बिना ही पैरो की नसें के माध्यम से हृदय तक पहुंचकर मरीज को नया वाल्व लगाया है। इस प्रक्रिया का टा्र्ंसकैथेटर एओटिक वाल्व रिप्लेसमेंट TAVR कहा जाता है।
ऐसे ही एक 70 वषीर्य मरीज सुमति (परिवतिर्त नाम) अपोलो हाॅस्पिटल बिलासपुर में सांस लेने में तकलीफ, घबराहट की समस्या के साथ डाॅ राजीव लोचन भांजा सीनियर कंन्संलटेंट, काॅडियोलाॅजी विभाग से मिली व उनकी ईको जांच में हृदय के महत्वपुणर् भाग एओटा, जिसमें हृदय में खून का संचारण होता है का एक वाल्व अत्यधिक सिकुड़ा हुआ था। ऐसी स्थिति में समस्या का सुनिश्चित समाधान करने के लिये एक हाई ग्रेड सिटी स्केन (128 स्लाईस) जो कि केवल अपोलो में ही उपलब्ध है, के द्वारा जांच की गयी। जिसमें एओटl का आकार की सटीक गणना करके उस आकार के वाल्व की व्यवस्था की गयी।
वाल्व को बदलने की प्रक्रिया ने निश्चैतना विभाग का भी महत्वपूणर् योगदान रहा। मरीज का उतनी ही बेहोश की दवा दी गयी कि वह स्वयं से सांस लेते हुये प्रक्रिया करवा सके। ऐसे में अपोलो के निश्चैतना विभाग के डाॅ विनीत श्रीवास्तव ने मरीज को सही निश्चैतना देकर प्रक्रिया को सफल बनाया। डाॅ राजीव लोचन भांजा ने बताया कि यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो पैरों की मोटी नस में गाईड वायर एवं कैथेटर डालकर हृदय तक पहुंचा जाता है एवं सही स्थान पर वाल्व को लगाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में 1 से 1ः30 घंटे का समय लगता है।
डाॅ मनोज नागपाल संस्था प्रमुख अपोलो हाॅस्पिटल बिलासपुर ने बताया कि इस प्रोसीजर को करने में अपोलो प्रबंधन ने पूरा सहयोग किया। महंगे वाल्व को केन्द्रीय खरीद के माध्यम से कम कीमत में मंगाया गया व डाॅक्टर एवं टीम को पूरा सहयोग उपलब्ध कराया गया।
उन्होंने बताया कि अपोलो हाॅस्पिटल ऐसे नवीन तकनीको को अपनाने में सदैव अग्रणी रहा है और मरीजों के हित में निरंतर नये उपकरणों व तकनीको का समावेश किया जावेगा।
डाॅ वैभव ओत्तलवार ने टीम को बधाई देवे हुये कहा कि यह अंचल में मरीजों के लिये व अपोलो हाॅस्पिटल बिलासपुर के लिये महत्वपूणर् उपलब्धि है। इस जटिल प्रक्रिया में सफलतापूवर्क संपादित कराने में डाॅ राजीव लोचन भांजा, डाॅ विनीत, वेंकटेश कैथलेब इंचाजर् व पूरी कैथलैब टीम का सहयोग रहा।
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