देहरादून। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की कुर्सी अफसरशाही के कारण चली गई। इसमे राज्य के मुख्य सचिव तो शामिल है ही, एक महिला अधिकारी की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। बताया जा रहा मुख्यमंत्री से संबंधित सारे फैसल महिला अधिकारी ही ले रही थी। मंत्री, विधायक और कार्यकर्ताओं से भी दुर्ब्यवहार करती थी। ये उन प्रदेशो के मुख्यमंत्रियों के लिए सबक है जो महिला अधिकारियों के कब्जे में है।

उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मंगलवार को सीएम पद से इस्तीफा दे दिया और तीरथ सिंह रावत ने 10वें मुख्यमंत्री के रूप शपथ ले लिया। लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री की कुर्सी जाने को लेकर किस्से अब सार्वजनिक होने लगे है। कहा जा रहा है कि उन्हें अपनी सीएम की कुर्सी आईएएस अफसरों के चलते गंवानी पड़ी। चर्चा है कि राज्य की बेलगाम अफसरशाही उनका सीएम पद ले डूबी। इन अफसरों को लेकर विधायक और त्रिवेंद्र सिंह रावत का मंत्रिमंडल भी नाराज था। कई बार सीएम से शिकायत के बाद भी उन्होंने इसे अनसुना कर दिया। बीजेपी विधायकों और बीजेपी कार्यकर्ताओं ने इस तरह सीएम के खिलाफ मोर्चा खोला कि आखिरकार पार्टी को सीएम बदलने का फैसला लेना पड़ा। अंदर खेमे में कहा जा रहा है कि दो आईएएस अधिकारियों का अहम रोल रहा। दो आईएएस अधिकारियों में सब बड़ा नाम राज्य के मुख्य सचिव ओम प्रकाश का है। ओम प्रकाश की नियुक्ती को लेकर प्रदेश बीजेपी में खूब घमासान मचा था। कई उनकी नियुक्ति को लेकर विरोध में थे। महिला अधिकारी को कहा जाता था सुपर सीएम, ओम प्रकाश के साथ राज्य में एक महिला अफसर हैं। इन महिला आईएएस अधिकारी से लोग इतना परेशान थे कि कई उन्हें पीछे से सुपर सीएम कहने लगे थे। आलम यह हो गया था कि कई लोग यहां तक कहते थे कि राज्य में सारे फैसले इन्ही महिला अधिकारी के जरिए ही लिए जाते रहे। नाराज विधायकों और नाराज पार्टी कार्यकर्ताओं की वजह से त्रिवेंद्र सिंह रावत जनता के बीच भी विलेन बनने लगे थे। पार्टी कार्यकर्ताओं ने कहना शुरू कर दिया था कि रावत जब पार्टी कार्यकर्ताओं की ही नहीं सुनते तो जनता की क्या सुनेंगे।
00 त्रिवेंद्र सिंह रावत से नहीं मिल पाते था कोई
बीजेपी के एक नेता ने कहा कि सीएम के इर्द गिर्द के दो आईएएस ऑफिसर की वजह से रावत के खिलाफ नाराजगी बढ़ी। वह उनसे मिलने का वक्त नहीं देते थे। कार्यकर्ता घंटों इंतजार करते थे, पर रावत के पास दो मिनट का टाइम भी नहीं होता था। एक नाराजगी यह भी बताई गई कि सीएम ने पहाड़ के लोगों की सुनने की बजाय यूपी से आए अफसरों पर ज्यादा भरोसा किया और पहाड़ वालों की कद्र नहीं की।
00 कार्यकर्ता भी नाराज
उत्तराखंड में जब बीजेपी की सरकार बनी तब उत्तराखंड के लोगों को बहुत उम्मीद थी लेकिन वह उम्मीद भी पूरी होती नहीं दिखी। युवाओं को रोजगार के मौके बढ़ने की उम्मीद थी लेकिन रोजगार नहीं मिला। युवाओं की नाराजगी भी रावत पर भारी पड़ी। सूत्रों के मुताबिक बीजेपी विधायकों ने पार्टी नेतृत्व को साफ कर दिया था कि अगर त्रिवेंद्र सिंह रावत के सीएम रहते चुनाव में जाना पड़ा तो उनकी अपनी सीट बचाना भी मुश्किल हो जाएगा। साफ कहा गया कि वह किस मुंह से जनता के बीच जाएंगे। सूत्रों के मुताबिक दिल्ली से भेजे गए पर्यवेक्षकों को भी बीजेपी के स्थानीय नेताओं ने कहा कि कार्यकर्ता इस हद तक नाराज है कि वह चुनाव में काम न करने की बात कर रहे हैं। हालांकि त्रिवेंद्र सिंह रावत के करीबियों का कहना है कि पार्टी के भीतर आंतरिक गुटबाजी की वजह से रावत की कुर्सी गई। उन्होंने कहा कि राज्य में पार्टी के कई नेताओं की नजर पहले दिन से सीएम की कुर्सी पर लगी थी और वह किसी भी तरह उन्हें हटाने की कोशिश में लगे थे। इसके लिए कई तरह की बातें की गई। एक नेता ने कहा कि पार्टी के भीतर की ब्राह्मण लॉबी भी रावत को हटाने के लिए लगातार काम कर रही थी।
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