बिलासपुर। राजस्व विभाग का काम हमेशा विवादों में ही रहता है। यदि ये विभाग सही काम करे तो 50 प्रतिशत मुकदमे ऐसे ही खत्म हो जाए। लेकिन पटवारी, RI अपनी हरकत से बाज नहीं आते लिहाजा लोगों को न्याय के लिए जूते घिसने पड़ते है। आज हम एक ऐसे मामले का जिक्र कर रहे है जिसमें नहर निर्माण के लिए जमीन अधिग्रहित की गई लेकिन मुआवजा को विवादित कर दिया। दरअसल एक जमीन पांच भाई बहनों में बंटी, फिर उसे नहर निर्माण के लिए अधिग्रहित किया गया। दो भाइयों को मुआवजा मिला लेकिन तीन भाई – बहन पिछले 6 साल से मुआवजा के लिए भटक रहे है।
हम बात कर रहे है मस्तूरी विकासखंड के ग्राम केंवटाडीह (भूतहा) का जहां से खारंग जलाशय के लिए शाखा नहर का निर्माण किया गया है। केंवटाडीह (भूतहा) के ख न 565/68 से एक एकड एक डिसमिल जमीन नहर के लिए अधिगृहित किया गया। जिसमें कृष्ण कुमार समेंत पांच भाई बहनों का नाम शामिल है। प्रत्येक के हिस्से से 20X5 डिसमिल जमीन अधिगृहित किया गया है। अधिग्रहण के बाद 21 डिसमिल जमीन का मुवावजा कृष्ण कुमार/कन्हैया को 2. 10 (दो लाखा दस हजार) रूपये मुआवजा दिया गया है। इसी तरह 20 डिसमिल का मुवावजा शालिनी तिवारी/रमेश को 2 लाखा रू. दिया गया। बांकी तीन हिस्सेदार सुरेन्द्र, उमेश, मनोरमा पिता कन्हैया लाल ख.क. 565/82, 83, 85 का मुआवजा 6 साल बाद भी नहीं दिया गया है। इन तीनो के हिस्से का मुआवजा 6 लाखा रूपये होता है। कई आवेदन देने के बाद भी कोई निराकरण नहीं हुआ है। पीड़ित किसानों का आरोप है कि तत्कालीन पटवारी राहूल साहू, नहर पटवारी मिरीजी और तत्कालीन अधिकारीगण मिलकर मुआवजा की राशि गोलमाल कर दिया है। जिसे मस्तुरी एस.डी.एम. भूअर्जन शाखा बचाने में लगे हुए है। तभी तो आज 6 साल से किसान अपने हक के लिये मारा-मारा फिर रहा है। यही नहीं मुवावजा नहीं मिलने पर किसान अपनी 60 डिसमिल जमीन वापस मांग रहे है तो जमीन भी नहीं दिया जा रहा है।
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