रायपुर। मानसून छत्तीसगढ़ की दहलीज पर खड़ा है और सरकार अभी तक 92 हजार 303 मीट्रिक टन धान की मिलिंग नहीं करा पाई है। यदि 15 दिन के अंदर मिलिंग नहीं हुई तो 286 करोड़ रुपए कीमत के धान का सड़ना तय है। समितियों और संग्रहण केंद्रों में रखे धान की कीमत 3100 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से 286 करोड़ रुपये से अधिक होता है।
सरकार प्रदेश में सुशासन तिहार जरूर मना रही है लेकिन कुव्यवस्था और भर्राशाही ने धान खरीदी योजना को पलीता लगा चुका है। पूरे प्रदेश के समितियों और संग्रहण केंद्रों में मिलिंग के लिए अभी भी 92 हजार 303 मीट्रिक टन धान पड़ा हुआ है। समय पर धान का उठाव और मिलिंग कराने के लिए न मंत्री स्तर पर गंभीर प्रयास हुए और न ही अधिकारियों के स्तर पर कोई ठोस पहल हुई। प्रभारी मंत्री और प्रभारी अधिकारी भी जिलों में बैठकें तो बहुत की लेकिन धान की मिलिंग को लेकर केवल औपचारिक चर्चा और निर्देश देकर भूल गए। नतीजा प्रदेश में अब 211 करोड़ यानी 2 अरब 11 करोड़ रुपए का धान सड़ने के कगार पर पहुंच गया है। क्योंकि प्रदेश में प्री मानसून की बारिश शुरू हो गई है। मतलब साफ है कि मानसून छत्तीसगढ़ के दहलीज पर आ के खड़ा हो गया है। जबकि इस बीच में धान समितियों में पड़ा रहा। यदि अधिकारी थोड़ा सा भी प्रयास कर लेते तो धान की मिलिंग हो चुकी होती।
आपको बता दें राज्य सरकार ने 14 नवंबर से 31 जनवरी तक न्यूनतम समर्थन मूल्य में कुल 149 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी की थी। अधिकांश धान मिलर्स और मार्कफेड के संग्रहण केंद्रों को भेजा गया। लेकिन अब भी कई उपार्जन केंद्रों में हजारों टन धान पड़ा है, जो रिकार्ड में दर्ज है। राज्य के 33 जिलों में से केवल 5 जिलों जांजगीर-चांपा, धमतरी, कोरिया, सरगुजा और सूरजपुर में ही खरीदे गए पूरे धान का उठाव या परिवहन किया गया है। बाकी जिलों में धान अब भी उपार्जन केंद्रों में पड़ा हुआ है। जबकि धान उपार्जन नीति के अनुसार किसी भी सोसाइटी में बफर स्टॉक लिमिट पूरी होने के 72 घंटे के भीतर धान का उठाव या परिवहन किया जाना अनिवार्य है। परंतु सैकड़ों समितियों में इस नियम का पालन नहीं किया और खरीदी के महीनों बीत जाने के बाद भी धान समितियों में पड़ा हुआ है। गर्मी के कारण पहले ही कई जगह धान का वजन घट गया है और अब प्रबंधकों को प्रति क्विंटल 2300 रुपये की दर से नुकसान की भरपाई करने के लिए कहा जा रहा है। कई प्रबंधकों को नोटिस जारी की गई हैं और FIR की चेतावनी दी गई है।
अभी तक बचा हुआ धान 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से लगभग 286 करोड़ रुपये से ज्यादा का होता है। यदि सरकार 15 से 20 दिन के अंदर धान का उठाव नहीं करा सकी तो 286 करोड़ रुपए के धान का सड़ना तय है। क्योंकि बारिश शुरू होते समितियों से धान का उठाव असंभव है। मजदूर खेती किसानी में जुट जाते है। यही स्थिति संग्रहण केंद्रों की है जहां पर कीचड़ और दलदल बन जाती है। लोड गाड़ियों को संग्रहण केंद्र से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।
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