बिलासपुर। बकरे की बलि देने को लेकर शुक्रवार को सिविल लाइन थाने में जमकर बवाल हुआ। बलि का विरोध करने वाले इतने अड़े की मंदिर के ट्रस्टी की थाने में पेशी भी हो गई। फिर भी बात नहीं बनीं तो थानेदार ने एक NGO को बुलाया और बकरा उसके सुपुर्द कर दिया। अब बलि के आड़ में बकरा खाने वाले हाथ मलते रह गए। बकरे की जान तो फिलहाल बच गई है। अब देखना ये है कि आखिर बकरा कब तक बचेगा। क्योकि उसे कटना तो है आज नही कटेगा तो कल कटेगा ?


थानों में भांति भांति के लोग आते और भांति-भांति की समस्याएं भी आती है। कई मामलों में पुलिस वालों का भी दिमाग चकरा जाता है आखिर किया क्या जाए ? जब मामला धर्म और स्वाद का आ जाए तो समस्या और बड़ी हो जाती है। यदि धर्म के आड़ स्वाद का मामला तो फिर भगवान ही मालिक है। ऐसा ही कुछ दिलचस्प मामला दो दिन पहले सिविल लाइन थाने में आया। जब बकरे को लेकर दो पक्ष आपस मे भीड़ गए। मामला मरीमाई मंदिर का था जहां बकरे को बलि देने की पूरी तैयारी हो चुकी थी। बलि देने वालों के मन मे लड्डू फुट रहे थे कि अब तो बस कटने ही वाला फिर बोटी का आनंद लेना ही है। इसी बीच पशुओं के लिए काम करने वाली निधि तिवारी मंदिर पहुंच गई और बलि का विरोध किया। बात नही बनी तो बकरे को लेकर थाने पहुंच गई। अब बकरा थाने में और बहस थानेदार के चेंबर में ? एक पक्ष का आरोप था कि मंदिर में बकरे की बलि दी जाती है और समय पे नही पहुंचते तो बकरे की बलि तय थी। थानेदार असमंजस में बलि रोकते है मरीमाई नाराज और नहीं रोकते है बलि प्रथा को बढ़ावा देने का आरोप ! आनन फानन में पूर्व महापौर उमाशंकर जायसवाल को बुलाया गया, जो मंदिर के ट्रस्टी है। उनसे पूछताछ की गई तो उन्होंने साफ इंकार कर दिया, कहा- मंदिर में बलि देने कोई प्रथा ही नही है! लेकिन शिकायत करने वाले मानने के लिए तैयार नहीं थे। उनका आरोप था कि पुजारी की मिलीभगत से मंदिर में बलि देने की तैयारी पूरी हो चुकी थी। घंटो बहस करने के बाद जब कोई भी पक्ष मानने के लिए तैयार नहीं हुए तो थानेदार सनीप रात्रे ने एक NGO को बुलाया और बकरे को उसके सुपुर्द कर दिया। तो फिलहाल थानेदार की पहल से बकरे की जान तो बच गई और बलि देने वाले हाथ मलते रह गए। लेकिन मरीमाई का प्रकोप किस पर भारी पड़ेगा ये वक्त ही बताएगा। लेकिन कहावत ये भी तो है कि आखिर बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी ? क्योकि स्वाद के शौक तो NGO वालों को भी होती है।
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