पंचतत्व में विलीन हुए आचार्य विद्यासागर, अंतिम दर्शन के लिए उमड़े श्रद्धालु, अपने माता – पिता को भी दी थी दीक्षा

डेस्क न्यूज। जैन धर्म के सबसे लोकप्रिय मुनि आचार्य विद्यासागर महाराज डोंगरगढ़ स्थित चंद्रगिरी पर्वत पर रविवार पंचतत्व में विलीन हो गए। इससे पहले जैन मुनि ने रात ढाई बजे समाधि (देह त्याग दी) ले ली थी। छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ स्थित चन्द्रगिरी तीर्थ पर उन्होंने अंतिम सांस ली। जैन मुनि के पंचतत्व में विलीन होने के बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने राजकीय शोक की घोषणा की है। इस दौरान कोई भी राजकिय समारोह या कार्यक्रम आयोजित नहीं किया जाएगा। उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए देशभर के भक्त और श्रद्धालु चंद्रगिरी पर्वत पहुंचे थे।

जाने-माने जैनमुनि आचार्य विद्यासागर जी महाराज ने छत्तीसगढ़ में राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ स्थित ‘चंद्रगिरि तीर्थ’ में ‘सल्लेखना’ करके रविवार को देह त्याग दी। जैन समाज समेंत पूरे देश के लिए यह बेहद दुखद खबर है। चंद्रगिरि तीर्थ की ओर से जारी एक बयान के अनुसार, ‘सल्लेखना’ जैन धर्म में एक प्रथा है, जिसमें देह त्यागने के लिए स्वेच्छा से अन्न-जल का त्याग किया जाता है। आचार्य विद्यासागर महाराज जैन समाज के सबसे प्रसिद्ध संत थे। वे आचार्य ज्ञानसागर के शिष्य थे। आचार्य ज्ञानसागर ने समाधि लेते समय अपना ‘आचार्य’ मुनि विद्यासागर को सौंप दिया था। 22 नवंबर 1972 में आचार्य बनते वक्त मुनि विद्यासागर की उम्र सिर्फ 26 साल थी। उनका जन्म 10 अक्टूबर 1946 को शरद पूर्णिमा के दिन कर्नाटक के बेलगांव जिले के चिक्कोड़ी गांव में हुआ था।

00 माता-पिता को भी दी थी दीक्षा
आचार्य विद्यासागर के पिता का नाम मल्लप्पाजी अष्टगे और माता का नाम श्रीमती अष्टगे था। बचपन में घर पर सभी उन्हें नीलू कहकर पुकारते थे। आचार्य विद्यासागर के बारे में कई बातें ऐसी हैं जो हैरान कर देने वाली हैं। उन्होंने अपने जीवन में 500 से अधिक लोगों को दीक्षा दी। खुद आचार्य विद्यासागर के माता और पिता ने भी उन्हीं से दीक्षा ली थी और बाद में उन्होंने समाधि ले ली।

00 22 साल की उम्र में बने ‘दिगंबर साधु’
आचार्य विद्यासागर को लोग उनके गहन आध्यात्मिक ज्ञान के लिए जानते थे। साल 1968 में सिर्फ 22 साल की उम्र में आचार्य ज्ञानसागर ने मुनि विद्यासागर को ‘दिगंबर साधु’ के रूप में दीक्षा दी और चार साल बाद उन्हें ‘आचार्य’ का पद प्राप्त हुआ। उन्होंने अपना जीवन जैन धर्मग्रंथों और दर्शन के अध्ययन और अनुप्रयोगों में समर्पित कर दिया। संस्कृत और अन्य भाषाओं पर उनकी अद्भुत पकड़ थी। उन्होंने खुद भी कई आध्यात्मिक ग्रंथ लिखे हैं।

00 ‘ब्रह्मांड के देवता’ के रूप में सम्मानित
जैन समुदाय में उनके कुछ व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त कार्यों में निरंजन शतक, भावना शतक, परीष जया शतक, सुनीति शतक और श्रमण शतक शामिल हैं। उन्होंने हिंदी को बढ़ावा देने और किसी भी राज्य में न्याय प्रणाली को उसकी आधिकारिक भाषा में बनाने के अभियान का भी नेतृत्व किया था। 11 फरवरी को आचार्य विद्यासागर महाराज को गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में ‘ब्रह्मांड के देवता’ के रूप में सम्मानित किया गया था।

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नीरजधर दीवान /संपादक - मोबाइल नंबर 8085229794
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